कुकू कोहली की डायरेक्शन की विरासत: वो फ़िल्में जिन्होंने बॉलीवुड के हॉरर और फ़ैमिली ड्रामा को बदल दिया
कुकू कोहली ने बॉलीवुड को 'वास्तु शास्त्र' और 'क्राइम पेट्रोल' जैसी कहानियां दीं। जानिए उनकी डायरेक्शन ने हॉरर और फ़ैमिली ड्रामा को कैसे नया चेहरा दिया।
मनोरंजन (ENTERTAINMENT)


बॉलीवुड में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो बड़े सितारों की आड़ में थोड़े छुप जाते हैं — लेकिन असल में उन्हीं ने उस दौर की फ़िल्मों को यादगार बनाया होता है। कुकू कोहली ऐसा ही एक नाम हैं। जब भी नब्बे के दशक और दो हज़ार के शुरुआती सालों की बात होती है, उनकी फ़िल्में दिमाग़ में ज़रूर घूमती हैं — चाहे वो डरावनी हो, भावुक करने वाली हो, या दोनों एक साथ। उन्होंने बॉलीवुड को एक ख़ास तरह की कहानी कहने का अंदाज़ दिया जो आज भी लोगों को याद है।
कौन हैं कुकू कोहली?
कुकू कोहली एक हिंदी फ़िल्म डायरेक्टर हैं जिन्होंने मुख्य रूप से हॉरर और फ़ैमिली ड्रामा की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। उनका असली नाम कुलदीप कोहली है, लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री में वो 'कुकू कोहली' के नाम से ही जाने जाते हैं। वो सिर्फ़ डायरेक्टर ही नहीं बल्कि प्रोड्यूसर भी रहे हैं, और उन्होंने टेलीविज़न की दुनिया में भी काफ़ी काम किया — ख़ासतौर पर 'क्राइम पेट्रोल' जैसे शो से उनका नाम घर-घर तक पहुंचा।
उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत यही रही कि उन्होंने हमेशा उस दर्शक को ध्यान में रखा जो मल्टीप्लेक्स सिनेमा का हिस्सा नहीं था, जो छोटे शहरों और कस्बों में बैठकर फ़िल्में देखता था। उनकी कहानियां आम घरों, आम इंसानों और उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ी होती थीं — बस उसमें एक डरावना या भावुक मोड़ जुड़ जाता था।
हॉरर को 'घर के क़रीब' लाने वाली फ़िल्में
कुकू कोहली की सबसे चर्चित फ़िल्मों में से एक है 'वास्तु शास्त्र' (2004), जिसमें सुष्मिता सेन मुख्य भूमिका में थीं। यह फ़िल्म इसलिए अलग थी क्योंकि इसने हॉरर को किसी पुराने किले या वीरान जंगल में नहीं, बल्कि एक नए-नवेले घर की चारदीवारी के अंदर रखा। एक मध्यमवर्गीय परिवार नया घर लेता है, सपने होते हैं, उम्मीदें होती हैं — और फिर धीरे-धीरे कुछ ऐसा होने लगता है जो समझ नहीं आता।
यही वो फ़ॉर्मूला था जिसने दर्शकों को असली डर दिया। क्योंकि वो डर 'अपना' लगता था। कोई भी देखने वाला सोच सकता था — "अरे, यही तो मेरे घर में भी हो सकता है।" बॉलीवुड हॉरर में उस वक्त तक ज़्यादातर या तो रामसे ब्रदर्स वाला 'B-grade' स्टाइल था, या फिर बहुत ही ऊपरी तौर का डरावनापन। कुकू कोहली ने बीच की एक राह निकाली — थोड़ा घरेलू, थोड़ा मनोवैज्ञानिक, और थोड़ा परंपरागत भारतीय मान्यताओं पर टिका हुआ।
'वास्तु शास्त्र' में वास्तु और घर की ऊर्जा का जो कॉन्सेप्ट इस्तेमाल हुआ, वो उस दौर के दर्शकों को बहुत क़रीब से छूता था — क्योंकि यह अंधविश्वास नहीं, बल्कि भारतीय घरों में सच में बातें होती थीं इस बारे में। फ़िल्म ने उस सांस्कृतिक डर को सिनेमाई ज़बान दी।
फ़ैमिली ड्रामा में इंसानी रिश्तों की परतें
हॉरर के अलावा कुकू कोहली ने फ़ैमिली ड्रामा में भी हाथ आज़माया, और वहां भी उनका नज़रिया वही रहा —सादा, ज़मीन से जुड़ा हुआ। उन्होंने ऐसी कहानियां चुनीं जिनमें परिवार के अंदर की टूटन, रिश्तों की खींचतान और भावनाओं का उतार-चढ़ाव असली लगे — न कि सिर्फ़ नाटकीय।
उनकी फ़िल्म 'प्यार तो होना ही था' (1998) इसी सोच की मिसाल है। अजय देवगन और काजोल की जोड़ी वाली इस रोमांटिक फ़ैमिली ड्रामा ने उस साल काफ़ी अच्छा कारोबार किया। फ़िल्म की कहानी में प्यार, गलतफ़हमियां और परिवार की भूमिका — ये सब इस तरह बुने गए थे कि दर्शक किरदारों से जुड़ाव महसूस करें। काजोल और अजय देवगन की केमिस्ट्री को कुकू कोहली ने बहुत स्वाभाविक तरीके से पर्दे पर उतारा, और यही फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त बनी।
इन फ़िल्मों में एक बात और ग़ौर करने वाली है — कुकू कोहली ने कभी भी सिर्फ़ स्टार पावर पर भरोसा नहीं किया। उनकी स्क्रिप्ट में हमेशा एक भावनात्मक धागा होता था जो पूरी फ़िल्म को बांधे रखता था। चाहे किरदार कितना भी बड़ा या छोटा हो, उसकी एक वजह होती थी कहानी में होने की।
टेलीविज़न पर उनका असर और 'क्राइम पेट्रोल' की विरासत
कुकू कोहली की बात करें और टेलीविज़न का ज़िक्र न हो — यह अधूरा रहेगा। 'क्राइम पेट्रोल' से उनका जुड़ाव भारतीय टीवी के सबसे लंबे और सफल प्रयोगों में से एक माना जाता है। यह शो असली घटनाओं पर आधारित क्राइम की कहानियां दिखाता था — लेकिन इसका लहजा सनसनीखेज़ नहीं, बल्कि सामाजिक था।
शो ने यह साबित किया कि भारतीय दर्शक सिर्फ़ मनोरंजन नहीं चाहता, वो कुछ ऐसा भी देखना चाहता है जो उसे सोचने पर मजबूर करे। 'क्राइम पेट्रोल' ने घरेलू हिंसा, साइबर क्राइम, धोखाधड़ी जैसे मुद्दों को उस आम दर्शक तक पहुंचाया जो अख़बार नहीं पढ़ता था। औरयह काम बिना किसी बड़े बजट या चमक-दमक के हुआ — सिर्फ़ कहानी की ताक़त से।
इस शो की वजह से कुकू कोहली का नाम उन लोगों तक भी पहुंचा जो शायद उनकी फ़िल्में नहीं देखते थे। टेलीविज़न ने उन्हें एक अलग तरह की पहुंच दी — हर उम्र के दर्शक तक, हर तबके तक। और यही उनकी सबसे बड़ी ताक़त रही — वो फ़िल्म और टीवी दोनों माध्यमों में एक जैसी संजीदगी से काम करते रहे।
कुकू कोहली की विरासत आज के नज़रिए से
आज जब बॉलीवुड में हॉरर की एक नई लहर आई है — 'स्त्री', 'भूल भुलैया' की सीरीज़, 'मुंजया' जैसी फ़िल्में — तो यह देखना दिलचस्प है कि इनमें से कई उसी सोच को आगे बढ़ाती हैं जो कुकू कोहली ने दो दशक पहले रखी थी। यानी हॉरर को भारतीय संस्कृति, घर और परिवार की जड़ों से जोड़ो — तभी वो असरदार होगा।
उन्होंने यह भी दिखाया कि हॉरर और इमोशन एक साथ चल सकते हैं। 'वास्तु शास्त्र' में जो माँ और बच्चे के रिश्ते की परत थी, वो सिर्फ़ डर नहीं दिखाती थी — वो दिल भी छूती थी। यही वो चीज़ है जो किसी फ़िल्म को सिर्फ़ 'देखी हुई' से 'याद रहने वाली' बनाती है।
बड़े स्टार, बड़े बजट और बड़े प्रचार के बिना भी कोई डायरेक्टर अपनी छाप छोड़ सकता है — कुकू कोहली इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। उनका काम यह याद दिलाता है कि कैमरे के पीछे बैठा इंसान अगर कहानी में यक़ीन रखता हो, तो वो यक़ीन पर्दे के आर-पार जाकर दर्शक तक पहुंचता ज़रूर है।
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निष्कर्ष के तौर पर — कुकू कोहली बॉलीवुड के उन डायरेक्टरों में हैं जिन्हें शायद उतना क्रेडिट नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। लेकिन उनकी फ़िल्में और शो आज भी बात करने लायक हैं — क्योंकि उन्होंने हमेशा दर्शक को केंद्र में रखा, न कि सिरफ़ में अपनी तारीफ़ को। अगर आप बॉलीवुड के उस दौर को समझना चाहते हैं जब हॉरर और फ़ैमिली ड्रामा एक साथ परदे पर ज़िंदा थे, तो कुकू कोहली की फ़िल्मों से बेहतर शुरुआत शायद ही कोई हो।
तो अगली बार जब आप किसी पुरानी हिंदी फ़िल्म की लिस्ट बनाएं — 'वास्तु शास्त्र' या 'प्यार तो होना ही था' को उसमें ज़रूर जगह दें। आपको अफ़सोस नहीं होगा।
