ईस्ट ज़ोन बनाम साउथ ज़ोन क्रिकेट: वो ज़ोनल रंजकता जिसने भारतीय क्रिकेट को एक नई पहचान दी

ईस्ट ज़ोन vs साउथ ज़ोन क्रिकेट का इतिहास, दुलीप ट्रॉफी से लेकर आज तक — जानो कब शुरू हुई यह ज़ोनल रंजकता और किसने बनाई इसकी असली पहचान।

मनोरंजन (ENTERTAINMENT)

9/7/20261 मिनट पढ़ें

क्रिकेट भारत में सिर्फ एक खेल नहीं है — यह एक भावना है, एक जुनून है, और कुछ मामलों में तो एक पहचान भी। जब बात ज़ोनल क्रिकेट की आती है, तो ईस्ट ज़ोन और साउथ ज़ोन के बीच का मुकाबला हमेशा कुछ अलग ही रहा है। एक तरफ बंगाल, ओडिशा, झारखंड और असम की माटी से उठे खिलाड़ी, दूसरी तरफ तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल के तेज़-तर्रार क्रिकेटर। जब ये दोनों ज़ोन आमने-सामने होते हैं, तो मैदान पर सिर्फ रन और विकेट नहीं, बल्कि दो अलग क्रिकेट संस्कृतियों का टकराव होता है। लेकिन यह ज़ोनल रंजकता आई कहाँ से? इसकी जड़ें कितनी गहरी हैं? चलो, थोड़ा पीछे चलते हैं।

दुलीप ट्रॉफी: जहाँ से शुरू हुई ज़ोनल पहचान

भारतीय ज़ोनल क्रिकेट की असली नींव रखी दुलीप ट्रॉफी ने। यह टूर्नामेंट भारत के पूर्व क्रिकेटर के.एस. दुलीपसिंहजी की याद में शुरू किया गया था, जो इंग्लैंड की तरफ से खेले थे लेकिन उनकी जड़ें भारतीय थीं। बीसीसीआई ने इसे 1961-62 सीज़न में शुरू किया और भारत को पाँच ज़ोन में बाँटा गया — नॉर्थ, साउथ, ईस्ट, वेस्ट और सेंट्रल।

इस टूर्नामेंट का मकसद था कि रणजी ट्रॉफी में अच्छा खेलने वाले खिलाड़ियों को एक बड़े मंच पर परखा जाए — जहाँ वे अपने ज़ोन की नुमाइंदगी करें और राष्ट्रीय टीम के सेलेक्टर्स की नज़रों में आएँ। यह टूर्नामेंट असल में एक "ब्रिज" था — रणजी और इंडिया कैप के बीच का।

ईस्ट ज़ोन और साउथ ज़ोन, दोनों ही शुरू से इस टूर्नामेंट में मज़बूत टीमें रहीं। साउथ ज़ोन ने शुरुआती दशकों में काफी दबदबा बनाया, क्योंकि तमिलनाडु और कर्नाटक से लगातार अच्छे खिलाड़ी निकलते रहे। वहीं ईस्ट ज़ोन की पहचान हमेशा बंगाल के तकनीकी बल्लेबाज़ों और कुछ धारदार गेंदबाज़ों से रही।

ईस्ट ज़ोन की पहचान: बंगाल का बौद्धिक क्रिकेट

ईस्ट ज़ोन का क्रिकेट हमेशा "थिंकिंग क्रिकेट" के लिए जाना गया। कोलकाता का ईडन गार्डन्स, जो दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियमों में से एक है, इस ज़ोन की शान रहा है। यहाँ के दर्शक क्रिकेट की बारीकियाँ समझते हैं और खिलाड़ियों पर उसी हिसाब से दबाव डालते हैं।

बंगाल के पंकज रॉय जैसे सलामी बल्लेबाज़ों ने 1950 और 60 के दशक में ईस्ट ज़ोन को एक भरोसेमंद पहचान दी। उन्होंने विनू माँकड़ के साथ मिलकर टेस्ट क्रिकेट में उस वक्त पहली विकेट के लिए जो रिकॉर्ड बनाया था, वह कई दशकों तक कायम रहा। बाद में सौरव गांगुली का उदय हुआ, जिन्होंने न सिर्फ ईस्ट ज़ोन बल्कि पूरे भारतीय क्रिकेट का चेहरा बदल दिया।

झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद महेंद्र सिंह धोनी भी ईस्ट ज़ोन का हिस्सा बने। धोनी का खेल और उनकी कप्तानी की समझ ने ईस्ट ज़ोन की साख को एक नए स्तर पर पहुँचाया। यानी यह ज़ोन सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं रहा — इसने पूरे पूर्वी भारत की क्रिकेट प्रतिभा को एक छत के नीचे लाने का काम किया।

साउथ ज़ोन की ताकत: तकनीक, अनुशासन और निरंतरता

अगर ईस्ट ज़ोन का क्रिकेट "भावना" से चलता है, तो साउथ ज़ोन का क्रिकेट "अनुशासन" से। दक्षिण भारत में क्रिकेट की एक मज़बूत अकादमिक परंपरा रही है। चेन्नई का चेपॉक स्टेडियम और बेंगलुरु का चिन्नास्वामी स्टेडियम — दोनों ने दशकों से बड़े-बड़े क्रिकेटर तैयार किए हैं।

साउथ ज़ोन ने दुलीप ट्रॉफी में कई बार खिताब जीता है और इसकी एक बड़ी वजह रही है यहाँ के खिलाड़ियों की तकनीकी मज़बूती। एस. वेंकटराघवन, ई.ए.एस. प्रसन्ना, बी.एस. चंद्रशेखर — ये वो स्पिन गेंदबाज़ थे जिन्होंने 1960 और 70 के दशक में साउथ ज़ोन और भारतीय क्रिकेट दोनों को एक अलग पहचान दी। इन तीनों ने मिलकर विपक्षी बल्लेबाज़ों को इस कदर उलझाया कि "इंडियन स्पिन क्वार्टेट" की धाक दुनियाभर में जम गई।

बाद में सुनील गावस्कर मुंबई से थे, लेकिन साउथ ज़ोन से आने वाले गुंडप्पा विश्वनाथ ने बल्लेबाज़ी में एक खास मुकाम हासिल किया। फिर राहुल द्रविड़ और अनिल कुंबले ने कर्नाटक और साउथ ज़ोन का झंडा और ऊँचा किया। द्रविड़ की "द वॉल" वाली छवि और कुंबले की अथक मेहनत — दोनों ने साबित किया कि साउथ ज़ोन का क्रिकेट लंबी रेस का घोड़ा है।

तमिलनाडु से वी.वी.एस. लक्ष्मण और बाद में आर. अश्विन जैसे खिलाड़ियों ने इस परंपरा को जारी रखा। अश्विन ने तो स्पिन गेंदबाज़ी को एक नए ज़माने में ले जाकर साबित कर दिया कि साउथ ज़ोन की स्पिन विरासत आज भी जीवित है।

दोनों ज़ोनों के बीच मुकाबला: जब मैदान पर भिड़ती हैं दो संस्कृतियाँ

ईस्ट ज़ोन और साउथ ज़ोन का आमना-सामना जब भी दुलीप ट्रॉफी या किसी ज़ोनल टूर्नामेंट में हुआ, तो वह मैच सिर्फ रन और विकेट की कहानी नहीं रहा। यह दो अलग क्रिकेट फिलॉसफी का टकराव रहा।

साउथ ज़ोन की टीम आमतौर पर गेंदबाज़ी में ज़्यादा विविधता लेकर आती है — तेज़ गेंदबाज़ी और स्पिन का अच्छा मिश्रण। वहीं ईस्ट ज़ोन की बल्लेबाज़ी लाइनअप अक्सर गहरी और अनुभवी रही है, जो लंबी पारियाँ खेलने में यकीन रखती है। यही वजह है कि इन दोनों के बीच मैच अक्सर रोमांचक और कड़े मुकाबले रहे हैं।

एक और दिलचस्प बात यह है कि दोनों ज़ोनों के खिलाड़ियों के बीच आईपीएल ने एक नया रिश्ता बना दिया। कोलकाता नाइट राइडर्स में साउथ के खिलाड़ी खेलते हैं और चेन्नई सुपर किंग्स में ईस्ट के। इससे दोनों ज़ोनों के क्रिकेट की समझ एक-दूसरे में मिलती-जुलती जा रही है, लेकिन ज़ोनल टूर्नामेंट में जब ये आमने-सामने होते हैं, तो वह पुरानी रंजकता फिर से ज़िंदा हो जाती है।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि दुलीप ट्रॉफी के फॉर्मेट में बीसीसीआई ने कई बार बदलाव किए। कुछ सालों तक यह टूर्नामेंट बंद भी रहा, फिर नए सिरे से शुरू हुआ। लेकिन जब भी यह टूर्नामेंट खेला गया, ईस्ट और साउथ के बीच का मुकाबला हमेशा एक खास आकर्षण लेकर आया।

निष्कर्ष

ईस्ट ज़ोन और साउथ ज़ोन की यह क्रिकेट रंजकता कोई आज की बात नहीं है — यह दशकों की मेहनत, परंपरा और जुनून से बनी है। एक तरफ ईडन गार्डन्स की भावुक भीड़ और गांगुली-धोनी जैसे कप्तानों की विरासत, दूसरी तरफ चेपॉक और चिन्नास्वामी कीतकनीकी परंपरा और कुंबले-द्रविड़-अश्विन जैसे दिग्गजों की छाप।

जब भी ये दोनों ज़ोन मैदान पर उतरते हैं, तो यह सिर्फ एक क्रिकेट मैच नहीं होता — यह भारत के दो अलग-अलग हिस्सों की पहचान का जश्न होता है। और यही वजह है कि ज़ोनल क्रिकेट, चाहे वह कितना भी कम कवरेज पाए, असली क्रिकेट प्रेमियों के दिल में हमेशा एक खास जगह रखता है।

अगर आप भारतीय क्रिकेट की गहराई को सच में समझना चाहते हैं, तो सिर्फ आईपीएल और टेस्ट मैच देखना काफी नहीं है — ज़ोनल क्रिकेट की इस विरासत को भी जानिए। यही वह मिट्टी है जहाँ से भारत के सबसे बड़े क्रिकेटर निकले हैं।

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